2025 की अशुभ शुरुआत पत्रकार मुकेश चंद्राकर की गुमशुदगी और फिर 3 जनवरी को बस्तर में एक सेप्टिक टैंक से उनकी लाश मिलने से हुई। कुछ दिन पहले ही उन्होंने सड़क निर्माण की खराब गुणवत्ता पर रिपोर्टिंग की थी।
यह घटना भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा किस कदर तार-तार हो चुकी है, इसकी एक मिसाल मात्र थी। साल भर में आठ पत्रकारों और एक सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर की हत्या की घटनाएं हुईं। यह जानकारी फ्री स्पीच कलेक्टिव की वर्ष 2025 के लिए एक रिपोर्ट “बिहोल्ड द हिडन हैन्ड” में दी गई है जो सोमवार (23 दिसंबर को) जारी की गई।
जिन पत्रकारों की हत्या हुई उनमें मुकेश चंद्राकर (छत्तीसगढ़) के अलावा राघवेंद्र बाजपाई (उत्तर प्रदेश – मार्च), लक्ष्मी नारायण सिंह (उत्तर प्रदेश – अक्टूबर), धर्मेंद्र सिंह चौहान (हरियाणा-मई), बसावराज कनाकोंड (कर्नाटक – अक्टूबर), नरेश (उड़ीसा – जुलाई), राजीव प्रताप सिंह (उत्तराखंड – सितंबर), शादाब डे (अंडमान निकोबार) और सोशल मीडिया इन्फ़लुएन्सर कंचन कुमारी (पंजाब – जून) शामिल हैं।
इसके अलावा पत्रकारों पर हमलों, प्रताड़ित करने, धमकाने की भी घटनाएं होती रहीं। दो पत्रकार, इरफान मेहराज (कश्मीर) और रूपेश कुमार सिंह (झारखंड) यूएपीए के तहत क्रमश: मार्च 2023 और जुलाई 2022 से जेलों में बंद हैं।
रिपोर्ट के अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उल्लंघन की 14875 घटनाएं दर्ज की गईं। आठ पत्रकारों समेत 117 लोगों को गिरफ्तार किया गया। सेंसरशिप और कानूनी कार्रवाई के 208 मामले दर्ज किए गए जो दर्शाता है कि बड़े पैमाने पर सेन्सरशिप और आपराधिक मामले लोगों के खिलाफ दर्ज किए गए।
पिछले एक दशक में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में भारत का निराशाजनक रिकार्ड नई बात नहीं है, फ्री स्पीच कलेक्टिव की तरफ से जुटाए गए सूक्ष्म डाटा बताता है कि सेन्सरशिप और इंटरनेट कंट्रोल के आंकड़ों में उछाल ने कैसे सभी नागरिकों को अपनी चपेट में ले लिया है।
सेन्सरशिप ने समाचार, सिनेमा, साहित्य और अकादमिक जगत किसी को नहीं बख्शा। जानकारी के प्रवाह को रेगुलेट करने के लिए सरकारी नीतियों और कानूनों का शिकंजा भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगातार कसता जा रहा है।
(विस्तृत रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है।)